मंच ने पहले ही मोबाइल तकनीक और 5जी नेटवर्क के क्षेत्र में काम करने वाली ख़्वावे कंपनी को भारत से निकालने के लिए अभियान छेड़ रखा है लेकिन अब इसका कहना है कि दूसरी चीनी टेलिकॉम कंपनियां भी भारत के लिए ख़तरा साबित हो सकती हैं.
एक बयान जारी कर मंच के प्रमुख अश्विनी महाजन ने कहा, "भारतीय टेलिकॉम नेटवर्क का एक बड़ा हिस्सा आज भी चीनी कंपनियों के क़ब्ज़े में है और चीनी सेना की मुख्य रणनीति में इन्फोर्मेशन डॉमिनेन्स भी शामिल है. इससे सुरक्षा को ख़तरा पैदा होने की आशंकाएं हैं और इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता."
इससे पहले अमरीका भी ख़्वावे कंपनी के उपकरणों के इस्तेमाल पर रोक लगा चुका है.
सूडान के विपक्षी गठबंधन ने पांच लोगों के नाम सुझाए हैं जो चुनाव से पहले देश का शासन संभालने वाली स्वायत्त परिषद में शामिल होंगे.
- ग्रीनलैंड दुनिया का बारहवां सबसे बड़ा भूभाग और दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है. ये एक भूभाग यूनाइटेड किंगडम से क़रीब दस गुना बड़ा है.
- 20 लाख वर्ग किलोमीटर का ये इलाका पत्थरों से भरा हुआ है और बर्फ़ की चादर से ढका रहता है.
- हालांकि यहां की जनसंख्या काफ़ी कम है. इस बड़े भूभाग में मात्र 57 हज़ार लोग रहते हैं.
- ग्रीनलैंड एक स्व-शासित देश है लेकिन ऊपरी तौर पर डेनमार्क का उस पर नियंत्रण है. ग्रीनलैंड के पास अपनी अलग सरकार है.
- ग्रीनलैंड के बजट का दो तिहाई हिस्सा डेनमार्क देता है. बाक़ी की आय का मूल स्रोत मत्स्य उद्योग है.
- ग्रीनलैंड के प्राकृतिक संसाधन, जैसे कोयला, तांबा, जस्ता और लौह-अयस्क है जिस कारण कई कंपनियों की दिलचस्पी इस इलाके में है.
- ग्रीनलैंड में आत्महत्या और शराबखोरी के मामले बहुत अधिक हैं. इसके साथ ही यहां बेरोज़गारी भी चरम पर है.
- माना जा रहा है जलवायु परिवर्तन का सीधा असर ग्रीनलैंड पर पड़ रहा है. यहां जमी बर्फ़ की चादर तेज़ी से पिघल रही है जिस कारण यहां की ज़मीन के नीचे के प्राकृतिक संसाधनों तक पहुंच की उम्मीद भी बढ़ रही है.
1867 में अमरीकी विदेश विभाग की एक रिपोर्ट आई थी जिसमें कहा गया था कि ग्रीनलैंड अमरीका के लिए रणनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण है. साथ ही यहां पर बड़ी मात्रा में संसाधन भी उपलब्ध हैं जिस कारण अमरीका इसे ख़रीद ले तो इसका लाभ होगा.
इस रिपोर्ट में लिखा था कि "राजनीतिक तौर पर और व्यापार के लिए अमरीका को आइसलैंड और ग्रानलैंड को ख़रीद लेना चाहिए."
काफी बड़ा समुद्रतट होने के कारण ग्रीनलैंड की फिशिंग इंडस्ट्री (मत्स्य उद्योग) बहुत बड़ा है. यहां कई बड़े बंदरगाह हैं और यहां की ज़मीन के नीचे कोयला का ज़खीरा दबा हुआ है. इसके अलावा कीमती खनिजों में भी ग्रीनलैंड भरपूर है जिसका लाभ दुनिया में अमरीका के प्रभुत्व को बढ़ाने के लिए किया जा सकता है.
हालांकि, इस संबंध में किसी तरह का "औपचारिक प्रस्ताव" 1946 तक नहीं पेश किया गया.
बिज़नेस इनसाइडर में छपी एक ख़बर के अनुसार इसके सालों बाद पूर्व राष्ट्रपति हैरी एस. ट्रूमैन ने डेनमार्क को ख़रीदने के लिए 10 करोड़ डॉलर (सोने में) की पेशकश की थी. आज के हिसाब से क़रीब 130 के बराबर होगी.
समाचार एजेंसी एपी के अनुसार राष्ट्रपति रणनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण ग्रीनलैंड के कुछ इलाकों के बदले वो अलास्का के कुछ हिस्सा देने के बारे में सोच रहे थे.
सेना के साथ हुए अहम समझौते के बाद बनने वाली इस परिषद के सदस्य आज शपथ लेंगे. सूडान की सेना भी पांच लोगों को नामित कर रही है.
विपक्ष के गठबंधन में शामिल सूडानी कांग्रेस पार्टी के महासचिव ख़ालिद उमर ने विश्वास जताया कि यह समझौता सफल रहेगा.
उन्होंने कहा, "संवैधानिक दस्तावेज़ एकदम साफ़ है- कार्यकारी शक्तियां मंत्री परिषद के पास रहेगी जो कि नागरिकों से बनी होगी. अहम फैसले लेने का अधिकार विधान परिषद के पास होगा. इसका मतलब है कि सत्ता नागरिकों के पास रहेगी."
हाल में अमरीका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड को ख़रीदने की इच्छा ज़ाहिर की थी. उनका कहना था कि अमरीका दुनिया के सबसे बड़े द्वीप को ख़रीद ले तो उन्हें अच्छा लगेगा.
ट्रंप के इस बयान पर कई लोगों ने आश्चर्य जताया है.
इस संबंध में अख़बार में एक लेख पढ़ने के बाद अमरीकी रेडियो ओनपीआर पर डेनमार्क के लिए पूर्व अमरीकी राजदूत रूफ़स गिफोर्ड कहते हैं, "मुझे इतनी हंसी आई कि मेरी आंखों में पानी आ गया."
अख़बार वॉल स्ट्रीट जर्नल के अनुसार ट्रंप का ये कहना कि उत्तर अटलांटिक और आर्कटिक के बीच के इस द्वीप को अमरीका को खरीदना चाहिए, ये बयान "थोड़ा संजीदा भी है और नहीं भी."
देश के कई और अख़बारों ने भी इस बयान को प्रकाशित किया. हालांकि कुछ ने कहा कि ट्रंप मज़ाक कर रहे थे, जबकि कुछ का कहना था कि ट्रंप इस मामले में बिल्कुल संजीदा हैं.