Tuesday, August 20, 2019

चीनी कंपनियां भारत के लिए ख़तरा

राष्ट्रीय जागरण मंच से जुड़ी संस्था स्वदेशी जागरण मंच का कहना है कि देश की सुरक्षा को चीनी कंपनियों से खतरा है.
मंच ने पहले ही मोबाइल तकनीक और 5जी नेटवर्क के क्षेत्र में काम करने वाली ख़्वावे कंपनी को भारत से निकालने के लिए अभियान छेड़ रखा है लेकिन अब इसका कहना है कि दूसरी चीनी टेलिकॉम कंपनियां भी भारत के लिए ख़तरा साबित हो सकती हैं.
एक बयान जारी कर मंच के प्रमुख अश्विनी महाजन ने कहा, "भारतीय टेलिकॉम नेटवर्क का एक बड़ा हिस्सा आज भी चीनी कंपनियों के क़ब्ज़े में है और चीनी सेना की मुख्य रणनीति में इन्फोर्मेशन डॉमिनेन्स भी शामिल है. इससे सुरक्षा को ख़तरा पैदा होने की आशंकाएं हैं और इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता."
इससे पहले अमरीका भी ख़्वावे कंपनी के उपकरणों के इस्तेमाल पर रोक लगा चुका है.
सूडान के विपक्षी गठबंधन ने पांच लोगों के नाम सुझाए हैं जो चुनाव से पहले देश का शासन संभालने वाली स्वायत्त परिषद में शामिल होंगे.
अमरीका के ग्रीनलैंड को ख़रीदने की बात सबसे पहली बार 1860 के दशक में चर्चा में आई थी. उस वक्त एंड्र्यू जॉनसन अमरीका के राष्ट्रपति हुआ करते थे.
1867 में अमरीकी विदेश विभाग की एक रिपोर्ट आई थी जिसमें कहा गया था कि ग्रीनलैंड अमरीका के लिए रणनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण है. साथ ही यहां पर बड़ी मात्रा में संसाधन भी उपलब्ध हैं जिस कारण अमरीका इसे ख़रीद ले तो इसका लाभ होगा.
इस रिपोर्ट में लिखा था कि "राजनीतिक तौर पर और व्यापार के लिए अमरीका को आइसलैंड और ग्रानलैंड को ख़रीद लेना चाहिए."
काफी बड़ा समुद्रतट होने के कारण ग्रीनलैंड की फिशिंग इंडस्ट्री (मत्स्य उद्योग) बहुत बड़ा है. यहां कई बड़े बंदरगाह हैं और यहां की ज़मीन के नीचे कोयला का ज़खीरा दबा हुआ है. इसके अलावा कीमती खनिजों में भी ग्रीनलैंड भरपूर है जिसका लाभ दुनिया में अमरीका के प्रभुत्व को बढ़ाने के लिए किया जा सकता है.
हालांकि, इस संबंध में किसी तरह का "औपचारिक प्रस्ताव" 1946 तक नहीं पेश किया गया.
बिज़नेस इनसाइडर में छपी एक ख़बर के अनुसार इसके सालों बाद पूर्व राष्ट्रपति हैरी एस. ट्रूमैन ने डेनमार्क को ख़रीदने के लिए 10 करोड़ डॉलर (सोने में) की पेशकश की थी. आज के हिसाब से क़रीब 130 के बराबर होगी.
समाचार एजेंसी एपी के अनुसार राष्ट्रपति रणनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण ग्रीनलैंड के कुछ इलाकों के बदले वो अलास्का के कुछ हिस्सा देने के बारे में सोच रहे थे.
सेना के साथ हुए अहम समझौते के बाद बनने वाली इस परिषद के सदस्य आज शपथ लेंगे. सूडान की सेना भी पांच लोगों को नामित कर रही है.
विपक्ष के गठबंधन में शामिल सूडानी कांग्रेस पार्टी के महासचिव ख़ालिद उमर ने विश्वास जताया कि यह समझौता सफल रहेगा.
उन्होंने कहा, "संवैधानिक दस्तावेज़ एकदम साफ़ है- कार्यकारी शक्तियां मंत्री परिषद के पास रहेगी जो कि नागरिकों से बनी होगी. अहम फैसले लेने का अधिकार विधान परिषद के पास होगा. इसका मतलब है कि सत्ता नागरिकों के पास रहेगी."
हाल में अमरीका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड को ख़रीदने की इच्छा ज़ाहिर की थी. उनका कहना था कि अमरीका दुनिया के सबसे बड़े द्वीप को ख़रीद ले तो उन्हें अच्छा लगेगा.
ट्रंप के इस बयान पर कई लोगों ने आश्चर्य जताया है.
इस संबंध में अख़बार में एक लेख पढ़ने के बाद अमरीकी रेडियो ओनपीआर पर डेनमार्क के लिए पूर्व अमरीकी राजदूत रूफ़स गिफोर्ड कहते हैं, "मुझे इतनी हंसी आई कि मेरी आंखों में पानी आ गया."
अख़बार वॉल स्ट्रीट जर्नल के अनुसार ट्रंप का ये कहना कि उत्तर अटलांटिक और आर्कटिक के बीच के इस द्वीप को अमरीका को खरीदना चाहिए, ये बयान "थोड़ा संजीदा भी है और नहीं भी."
देश के कई और अख़बारों ने भी इस बयान को प्रकाशित किया. हालांकि कुछ ने कहा कि ट्रंप मज़ाक कर रहे थे, जबकि कुछ का कहना था कि ट्रंप इस मामले में बिल्कुल संजीदा हैं.