Wednesday, May 15, 2019

नीतीश को अपने ही गढ़ नालंदा में मिल रही दमदार चुनौती

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को अपने ही गढ़ नालंदा में इस बार विपक्षी महागठबंधन की तगड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है.
यह चुनौती कितनी तगड़ी है इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि नीतीश कुमार ने हरनौत के मनरेगा भवन के मैदान में करीब पंद्रह सौ लोगों की चुनावी सभा को संबोधित करने के बाद जब पूछा कि "आप लोग हाथ उठाकर कहें, तो उम्मीदवार कौशलेंद्र कुमार को जीत का माला पहना दें", इस सवाल के जवाब में लोगों ने कोई बहुत उत्साह नहीं दिखाया. नीतीश कुमार को ये सवाल तीन बार पूछना पड़ा.
दरअसल कौशलेंद्र कुमार, नीतीश कुमार के बेहद खास माने जाते हैं और वे पिछली दो लोकसभा से क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं और इलाके के कई मतदाताओं का मानना है कि नीतीश जी को इस बार उम्मीदवार बदलना चाहिए था.
लेकिन कौशलेंद्र कुमार अपनी जीत के प्रति आश्वस्त हैं. वे दावा करते हैं, "देखिए 2014 में तो हमारा दल अकेले चुनाव लड़ा था लेकिन हम जीते थे. इस बार तो रामविलास पासवान जी भी साथ में हैं, एनडीए है तो कहीं ज़्यादा समर्थन मुझे मिल रहा है."
वहीं इस सीट से महागठबंधन में जीतन मांझी की हम पार्टी के उम्मीदवार चंद्रवंशी अशोक आज़ाद पहली बार चुनाव मैदान में हैं. उनका दावा है कि इस सीट पर उनके सामने कोई चुनौती ही नहीं है क्योंकि स्थानीय समीकरण उनके पक्ष में हैं.
हालांकि नीतीश कुमार के चलते यह इतना आसान नहीं दिखता है. दो बार सांसद रहने के बाद भी कौशलेंद्र कुमार की अपनी कोई पुख्ता पहचान इलाके में नहीं बन पायी है और लोग उनको नीतीश कुमार के प्रतिनिधि के तौर पर ही क्षेत्र से चुनाव जिताते आए हैं.
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि इस बार कौशलेंद्र कुमार के लिए मुश्किल इतनी ज़्यादा क्यों हो रही है. इस मुश्किल को भांपते हुए नीतीश कुमार नालंदा में लगातार चार दिन सभा कर चुके हैं और आने वाले दिनों में भी उनकी सभाओं का सिलसिला जारी रहने की उम्मीद है.
इलाके के एक मतदाता ने बताया कि "जब दो-तीन दिन बचेगा तो नीतीश जी तो यहां कैंप भी कर देंगे." पिछली बार भी उन्हें करना पड़ा था. काफी ज़ोर आजमाइश करने के बाद भी 2014 में कौशलेंद्र कुमार दस हज़ार से भी कम वोट से चुनाव जीतने में कामयाब हुए थे.
तब आरजेडी और राम विलास पासवान की पार्टी का गठबंधन था और यहां से लोजपा के उम्मीदवार को तीन लाख से ज़्यादा वोट मिले थे.
इस बार महागठबंधन में राम विलास पासवान तो नहीं हैं, लेकिन गठबंधन पांच पार्टियों का बना है, जिसके चलते नीतीश कुमार कोई कसर नहीं रहने देना चाहते हैं.
कौशलेंद्र कुमार कहते हैं कि नीतीश जी के सुशासन में क्षेत्र का काफी विकास हुआ है और यही वजह है कि लोग सबकुछ से उठकर उन्हें समर्थन देंगे.
नालंदा के एकंगरसराय, इस्लामपुर, बिहारशरीफ़ और राजगीर जैसे विधानसभाओं में सड़कें गांव-गांव तक पहुंची हुई हैं, बिजली और पानी का संकट भी नहीं है. पहली नज़र में यह इलाका विकसित नज़र आता है.
बावजूद इन सबके नालंदा के चुनाव में सबसे अहम भूमिका जातिगत समीकरणों की ही है. यहां सबसे ज़्यादा मतदाता कुर्मी समुदाय के हैं. नीतीश कुमार और कौशलेंद्र कुमार भी इसी समुदाय के हैं और इनके मतदाताओं की संख्या चार लाख 12 हज़ार है.
इस बार महागठबंधन में राम विलास पासवान तो नहीं हैं, लेकिन गठबंधन पांच पार्टियों का बना है, जिसके चलते नीतीश कुमार कोई कसर नहीं रहने देना चाहते हैं.
कौशलेंद्र कुमार कहते हैं कि नीतीश जी के सुशासन में क्षेत्र का काफी विकास हुआ है और यही वजह है कि लोग सबकुछ से उठकर उन्हें समर्थन देंगे.
नालंदा के एकंगरसराय, इस्लामपुर, बिहारशरीफ़ और राजगीर जैसे विधानसभाओं में सड़कें गांव-गांव तक पहुंची हुई हैं, बिजली और पानी का संकट भी नहीं है. पहली नज़र में यह इलाका विकसित नज़र आता है.
बावजूद इन सबके नालंदा के चुनाव में सबसे अहम भूमिका जातिगत समीकरणों की ही है. यहां सबसे ज़्यादा मतदाता कुर्मी समुदाय के हैं. नीतीश कुमार और कौशलेंद्र कुमार भी इसी समुदाय के हैं और इनके मतदाताओं की संख्या चार लाख 12 हज़ार है.

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