Monday, August 13, 2018

कांस्टीट्यूशन क्लब के बाहर उमर ख़ालिद पर गोली चली

विवादों में रहे जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र उमर ख़ालिद पर दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब के बाहर गोली चली है.
प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक उमर ख़ालिद रफ़ी मार्ग पर एक चाय की दुकान पर एक सफेद कमीज़ पहने शख़्स ने आकर उमर ख़ालिद को धक्का दिया और गोली चलाई, ख़ालिद के गिर जाने की वजह से गोली उन्हें नहीं लगी.
ज्वाइंट सीपी अजय चौधरी ने बीबीसी को बताया है कि जहां पर उमर ख़ालिद पर गोली चलाई गई है उस जगह से एक पिस्टल बरामद हुई है.
कितनी राउंड गोली चली है, ये पूछे जाने पर अजय चौधरी ने कहा कि जांच की जा रही है.
लेकिन हादसे के वक्त ख़ालिद के साथ होने का दावा करने वाले ख़ालिद सैफ़ी ने बीबीसी को बताया कि दो राउंड गोली चली है.
संसद भवन के पास ये इलाक़ा दिल्ली के सबसे सुरक्षित इलाक़ों में गिना जाता है.
ख़ालिद कांस्टीट्यून क्लब में खौफ़ से आज़ादी नाम एक कार्यक्रम में शामिल हो रहे थे.
कौन हैं उमर ख़ालिद
उमर ख़ालिद जेएनयू के छात्र नेता हैं, जिन पर विश्वविद्यालय के अंदर भारत विरोधी नारे लगाए जाने के आरोप लगे थे.
इस मामले में फरवरी, 2016 में जेएनयू के छात्र नेता कन्हैया कुमार और अनिर्बान भट्टाचार्य के साथ गिरफ़्तार किए गए थे. हालांकि उमर ख़ालिद ने हमेशा ये कहा कि उन्होंने भारत विरोधी नारे कभी नहीं लगाए.
वैसे इसी मामले में जेएनयू प्रशासन ने उमर ख़ालिद और कन्हैया कुमार को पीएचडी की डिग्री देने से इनकार कर दिया था. इन दोनों को अपनी थीसिस जमा नहीं करने दी जा रही थी.
हालांकि दिल्ली हाइकोर्ट के दख़ल के बाद इन दोनों ने अपनी थीसिस जमा करा दी है.2 अगस्त के 'टाइम्स ऑफ़ इंडिया' में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जो दो पेज लंबा इंटरव्यू छपा है, उसमें वह कौन सी बात है जिसे पढ़ते हुए लगे कि हम कुछ नया पढ़ रहे हैं?
एक तरह से यह पूरा इंटरव्यू पिछले दो-एक वर्षों में अलग-अलग मंचों पर प्रधानमंत्री के भाषणों का संकलन भर है.
इसमें एक भी ऐसा तथ्य नहीं है जिसे प्रधानमंत्री या उनकी सरकार के दूसरे मंत्री पहले जनता के सामने नहीं रख चुके हैं.
निश्चय ही यह अख़बार की नाकामी नहीं है, उस प्रधानमंत्री की भी सीमा है जिसने देश के सार्वजनिक मीडिया के सबसे विश्वसनीय और सबसे बड़ी पहुंच वाले अख़बारों में एक 'टाइम्स ऑफ़ इंडिया' के दो पृष्ठों का इस्तेमाल पाठकों से जीवंत संवाद बनाने की जगह सरकारी किस्म के प्रचार भर में किया.
मसलन, जब वे गोरक्षा के नाम पर होने वाली हिंसा की सख़्त आलोचना करते हुए राज्य सरकारों से कड़ी कार्रवाई की अपील कर रहे थे, तब कोई पत्रकार सामने होता तो उनको याद दिला सकता था कि दरअसल, उनकी ही सरकार के मंत्री ऐसी हिंसा के मुज़रिमों को माला पहनाते और दंगाइयों को आश्वस्त करते देखे गए हैं. और ये भी याद दिलाता कि राज्यों में भी उनकी ही पार्टी की सरकारें हैं.
इसी तरह जब वे अपने साहसिक आर्थिक फ़ैसलों का ज़िक्र कर रहे थे और अंसगठित क्षेत्र से 80 प्रतिशत रोज़गार की बात कर रहे थे तो कोई पूछ सकता था कि नोटबंदी जैसे 'साहसिक' फ़ैसले ने क्या सबसे ज़्यादा अंसगठित क्षेत्र के मज़दूरों पर चोट नहीं की?
या फिर इसके वास्तविक परिणाम क्या रहे? या यही कि आज तक रिज़र्व बैंक नोटबंदी में लौटे नोट क्यों नहीं गिन पाया?
ऐसे सवाल और भी हो सकते हैं, लेकिन यह सब तब हो पाता जब इंटरव्यू आमने-सामने बैठकर होता, लेकिन आमने-सामने बैठकर ऐसे इंटरव्यू प्रधानमंत्री ने कब दिए हैं और किनको दिए हैं?
उन गिने-चुने टीवी चैनलों और पत्रकारों को, जिनके बारे में यह राय है कि वे प्रधानमंत्री और सरकार के खुले समर्थक हैं, संभवतः उनका सबसे लंबा लाइव इंटरव्यू इसी साल 18 अप्रैल को लंदन के वेस्टमिन्स्टर सेंट्रल हॉल में प्रसून जोशी ने लिया था, लेकिन तीन घंटे से ऊपर चला यह पूरा इंटरव्यू प्रधानमंत्री की ऐसी प्रशस्ति से भरा था कि इससे प्रसून जोशी की अपनी छवि ख़राब हो गई.

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